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एक बार, एक छोटे से गाँव में एक बच्चा था। उसका नाम मोहन था। मोहन के पास एक आखिरी सिक्का था। वह सिक्का उसके लिए बहुत खास था।
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मोहन ने सोचा कि वह इस सिक्के से कुछ खास चीज़ खरीदेगा। उसने अपने दोस्तों से कहा, "मैं अपने आखिरी सिक्के से एक मिठाई खरीदूंगा।"
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मोहन ने मिठाई की दुकान पर जाकर सिक्का दिया। लेकिन वहाँ एक वृद्ध व्यक्ति, रामू, भी था। रामू ने मुस्कुराते हुए कहा, "बेटा, क्या तुम इस सिक्के से किसी की मदद करना चाहोगे?"
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मोहन ने सोचा, "मैं रामू जी की मदद कर सकता हूँ।" उसने रामू को सिक्का दिया और कहा, "आप इसे ले लीजिए।" रामू ने कहा, "धन्यवाद, बेटा। तुमने बहुत अच्छा काम किया।"
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मोहन को एहसास हुआ कि ईमानदारी और दोस्ती सबसे महत्वपूर्ण हैं। उसने सोचा, "यह सिक्का मेरे लिए नहीं, बल्कि दूसरों की मदद के लिए है।"
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मोहन ने अपने दोस्तों को बताया कि सच्चा सुख दूसरों की मदद करने में है। उसने सीखा कि सचाई और दोस्ती हमेशा सबसे बड़े धन होते हैं।
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